¡Sorpréndeme!

रानी लक्ष्मीबाई: झाँसी की वीरांगना की अदम्य कहानी

2024-10-10 5 Dailymotion

रानी लक्ष्मीबाई का नाम भारतीय इतिहास में साहस, दृढ़ता, और स्वतंत्रता संग्राम की मिसाल के रूप में अंकित है। उनका जीवन एक प्रेरक गाथा है, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में न केवल अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि उन्होंने अपनी बहादुरी से यह साबित किया कि भारतीय नारी किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम है।

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को काशी (वाराणसी) में हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था, लेकिन घर में सब उन्हें प्यार से ‘मनु’ बुलाते थे। उनके पिता मोरोपंत तांबे एक मराठी ब्राह्मण थे और उनकी माता भागीरथी सप्रे एक धार्मिक और समझदार महिला थीं। छोटी उम्र में ही लक्ष्मीबाई की माता का देहांत हो गया, और उनके पिता ने उन्हें संस्कार, शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा दी।

विवाह और झाँसी की रानी बनना
1842 में मणिकर्णिका का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ और उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस विवाह के बाद, वे झाँसी की रानी बन गईं। उनके जीवन में एक नया मोड़ आया जब 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन दुर्भाग्यवश, उनका पुत्र कुछ समय बाद ही चल बसा। इस गहरे दुख के बाद, गंगाधर राव और रानी लक्ष्मीबाई ने एक दत्तक पुत्र को गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया।

स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत
1857 का वर्ष भारत के इतिहास में एक महान क्रांति का वर्ष था। इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह के रूप में जाना जाता है। इस विद्रोह के दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की रक्षा का बीड़ा उठाया। अंग्रेजों ने झाँसी पर हमला करने की योजना बनाई, लेकिन रानी लक्ष्मीबाई ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी अंतिम सांस तक लड़ेगी।

झाँसी की रक्षा
1858 में, ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज़ ने झाँसी पर बड़ा हमला किया। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सेना के साथ कई दिनों तक झाँसी के किले की रक्षा की, लेकिन अंग्रेजों की सेना बड़ी और अधिक सुसज्जित थी। किला चारों ओर से घिर गया, परंतु रानी लक्ष्मीबाई ने हार मानने से इनकार कर दिया।